मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

धूंधुकारी को प्रेत योनि की प्राप्ति और उससे उद्धार

धूंधुकारी को प्रेत योनि की प्राप्ति और उससे उद्धार

श्रीमद् भागवत - पाँचवा अध्याय

आत्मदेव ब्राम्ह ण संतान न होने से दुखी था | वन में महात्मा ने उसे एक फल देकर कहा की इसे अपनी स्त्री को खिला दे |उसकी पत्नी धूंधुलि ने फल गाय को खिला दिया | धूंधुलि ने अपनी बहिन के साथ मिलकर नाटक रचा | उसकी बहिन उस समय  गर्भवती थी | धूंधुलि खुद गर्भवती  होने का नाटक करती रही | समय आने पर उसने अपनी बहिन का बच्चा ले लियाऔर लोगो को कह दिया की उसकी
बहिन को मरा हुआ बच्चा हुआ है | इस काम के लिए बहिन के पति को बहुत सा धन भी दिया | इस तरह धूंधुलि ने अपने बच्चे का नाम धूंधुकारी रखा | कुछ समय बाद गाय को भी मनुष्यकार बच्चा हुआ |
उसके गाय के जेसे कान होने से आत्मदेव ने
उसका नाम गौ कर्ण रखा | धूंधुकारी बहुत ही दुष्ट तथा हिंसक प्रवृति का था |इसके विपरीत गौ कर्ण ज्ञानी और दानी था | धूंधुकारी से तंग आकर आत्मदेव वन को
चले गये |
पिता के वन चले जाने पर एक दिन
धूंधुकारी ने अपनी माता को बहुत पीटा और कहा - बता ! धन कहाँ रखा है ? नहीं तो जलती लकड़ी से तेरी खबर लूँगा |उसकी इस धमकी से डर कर तथा दुखी
होकर धूंधुलि ने कुएँ में गिर कर प्राण त्याग दिए | धूंधुकारी पाँच वैश्याओं के साथ घर में रहने लगा |
वह जहाँ तहाँ से बहुत सा धन चुरा के लाता | चोरी का माल देख कर एक दिन वैश्याओं ने सोचा -" यह नित्य ही चोरी करता है | इसे अवश्य ही राजा पकड़ लेगा
और कड़ा दंड देगा | इसे मारकर , सारा
माल लेकर हम कहीं चली जाएँगी | " ऐसा निश्चय करके उन्होने सोए हुए धूंधुकारी को रस्सी से कस दिया और गले में फाँसी लगाकर मारने का प्रयत्न किया | इससे भी
वह नही मारा तो उस के मुख पर जलते हुए
अंगारे डाले | इससे वह तड़प तड़प कर मर गया | उन्होने उसके शरीर को एक गड्ढे में डाल कर गाढ दिया|
धूंधुकारी अपने कर्मों के कारण भयंकर प्रेत हुआ | वह सर्वदा दसों दिशाओं में भटकता रहता था | और भूख प्यास से व्याकुल होने के कारण " हा देव ! ! हा देव ! ! "
चिल्लाता रहता था परंतु उसे कोई आश्रय नही मिलता |
जब गौ कर्ण को अपने भाई की मृत्यु का समाचार मिला तो उन्होने उसका गयाजी में श्राद्ध किया | वह जहाँ भी जाते ,धूंधुकारी के नाम से दान करते | घूमते घूमते
वह अपने नगर पहुँचे | रात्रि के समय अपने
घर के आँगन मे सो गये | अपने भाई गौ कर्ण को सोया देख धूंधुकारी ने अपना विकट रूप दिखाया | वह कभी भे ड़ा , हाथी ,भेंसा तो कभी इंद्र , अग्नि का रूप धारण
करता | अंत में वह मनुष्यकार में प्रकट हुआ | ये विपरीत अवस्थाएं देख कर गौ कर्ण ने निश्चय कर लिया था की यह अवश्य ही दुर्गति को प्राप्त हुआ है |
तब उन्होनें धैर्य पूर्वक पूछा - " तू कौन है ?
रात्रि के समय एसा भयानक रूप क्यूँ
दिखा रहा है ? तेरी यहा दशा कैसे हुई ? "
गौ कर्ण के इस प्रकार पूछने पर प्रेत ज़ोर
ज़ोर से रोने लगा | उसने कहा - मैं तुम्हारा
भाई धूंधुकारी हूँ | मैं महान अज्ञान में
चक्कर काट रहा था | मैने लोगों की बड़ी
हिंसा की | इसी से मैं प्रेत योनि में
पड़कर दुर्दशा भोग रहा हूँ | भाई ! तुम दया
के सागर हो | कैसे भी करके मुझे इस प्रेत
योनि से मुक्ति दिलाओ |
गौ कर्ण ने कहा - मैने तुम्हारे लिए विधि
पूर्वक गया जी में पिंड दान किया | फिर
भी तुम्हे मुक्ति नहीं मिली | मुझे क्या
करना चाहिए ? प्रेत बोला - मेरी मुक्ति
सैंकड़ों गया श्राद्ध से भी नहीं हो सकती |
गौ कर्ण ने कहा - तब तो तुम्हारी मुक्ति
असंभव है | तुम अभी निर्भय होकर अपने
स्थान पर रहो | मैं विचार करके तुम्हारी
मुक्ति के लिए उपाय करूँगा |
गौ कर्ण की आग्या पाकर धूंधुकारी वहाँ
से चला गया | सुबह होने पर गौ कर्ण ने
लोगों को सारी बात बताई | उनमें से जो
विद्वान थे , उन्होने कहा की इस विष य
में जो सूर्यनारायण कहें वही करना
चाहिए | अतः गौ कर्ण ने अपने तपोबल से
सूर्य की गति को रोक दिया | उन्होने
स्तुति की - भगवान ! आप सारे संसार के
साक्षी हैं | कृपा करके मुझे धूंधुकारी की
मुक्ति का उपाय बताएँ | तब सूर्यनारायण
ने कहा - श्रीमद् भागवत से मुक्ति हो
सकती है | उसका सप्ताह परायण करो |
गौ कर्ण जी निश्चय करके कथा सुनाने को
तैयार हो गये | जब गौ कर्ण जी कथा
सुनाने को व्यास गद्दी पर बैठकर कथा कहने
लगे , तब प्रेत भी वहाँ आ गया इधर उधर
बैठने का स्थान ढूढ़ने लगा | तब वह सात
गाँठ के एक बाँस के छेद में घुसकर बैठ
गया |
सायँ काल को जब कथा को विश्राम
दिया गया , तभी बाँस की एक गाँठ
त ड़ त ड़ करती हुई फट गयी | दूसरे दिन
दूसरी गाँठ | इस प्रकार से सात दिनों में
सातों गाँठों को फोड़कर , बारह स्कंधो
को सुनकर , धूंधुकारी प्रेत योनि से मुक्त
हो गया और दिव्य रूप धारण करके सब के
सामने प्रकट हुआ | उसने तुरंत गौ कर्ण को
प्रणाम करके कहा - भाई ! तुमने कृपा करके
मुझे प्रेत योनि से मुक्ति दिला दी | यह
प्रेत पीड़ा का नाश करने वाली श्रीमद्
भागवत कथा धन्य है |
जिस समय धूंधुकारी यह सब बातें कह रहा
था , उसी समय उसके लिए वैकुंठ वासी
पार्षदों सहित विमान उतरा | सब लोगों
के सामने धूंधुकारी उसमें चढ़ गया | तब
गौ कर्ण ने कहा - भगवान के प्रिय
पार्षदों ! यहाँ तो अनेक श्रोता गण हैं |
फिर उन सब के लिए आप लोग बहुत से
विमान क्यूँ नहीं लाए ? यहाँ सभी ने
समान रूप से कथा सुनी है | फिर अंत में
इस प्रकार का भेद क्यूँ ?
भगवान के सेवकों ने कहा - इस फल भेद
का कारण इनका श्रवण भेद ही है | श्रवण
तो सभी ने समान रूप से किया , परंतु
इसके ( प्रेत ) के जैसा मनन नहीं किया |
इस प्रेत ने सात दिन तक निराहार श्रवण
किया था | अतः मुक्ति को प्राप्त हुआ |
एसा कहकर हरी कीर्तन करते हुए पार्षद
वैकुंठ लोक चले गये |
श्रावण मास में गौ कर्ण जी ने फिर से
सप्ताह क्रम में कथा कही और उन
श्रोताओं ने फिर से कथा सुनी | इस बार
भक्तो के लिए विमान के साथ भगवान
प्रकट हुए | भगवान स्वयं हर्षित होकर अपने
पाँच जन्य शंख से ध्वनि करने लगे तथा
गौ कर्ण को हृदय से लगा कर अपने समान
बना लिया |
यह कथा बहुत पवित्र है | एक बार के
श्रवण से ही समस्त पाप राशि को नष्ट
कर देती है | यदि इसका श्राद्ध के समय
पाठ किया जाए , तो इससे पित्र गण को
बड़ी तृप्ति मिलती है | और नित्य पाठ
करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है |

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें