सोमवार, 7 सितंबर 2015

राजा परीक्षित का पश्चाताप

राजा परीक्षित का पश्चाताप

राजगृह में पहुँच कर जब राजा परीक्षित ने अपना मुकुट उतारा तो कलियुग का प्रभाव समाप्त हो गया और ज्ञान की पुनः उत्पत्ति हुई। वे सोचने लगे कि मैने घोर पाप कर डाला है। निरपराध ब्राह्मण के कंठ में मरे हुये सर्प को डाल कर मैंने बहुत बड़ा कुकृत्य किया है। इस प्रकार वे पश्चाताप कर रहे थे कि ऋषि शमीक का भेजा हुआ एक शिष्य ने आकर उन्हें बताया कि ऋषिकुमार ने आपको श्राप दिया है कि आज से सातवें दिन तक्षक सर्प आपको डस लेगा। राजा परीक्षित ने शिष्य को प्रसन्नतापूर्वक आसन दिया और बोले – “ऋषिकुमार ने श्राप देकर मुझ पर बहुत बड़ा उपकार किया है। मेरी भी यही इच्छा है कि मुझ जैसे पापी को मेरे पाप के लिय दण्ड मिलना ही चाहिये। आप ऋषिकुमार को मेरा यह संदेश पहुँचा दीजिये कि मैं उनके इस कृपा के लिये उनका अत्यंत आभारी हूँ।” उस शिष्य का यथोचित सम्मान कर के और क्षमायाचना कर के राजा परीक्षित ने विदा किया।
राजा परीक्षित ने अपने जीवन के शेष सात दिन को ज्ञान प्राप्ति और भगवत्भक्ति में व्यतीत करने का संकल्प कर लिया। अपने समर्थ पुत्र जनमेजय का राज्याभिषेक कर दिया और समस्त राजसी वस्त्राभूषणों को त्यागकर तथा केवल चीर वस्त्र धारण कर गंगा के तट पर बैठ गये। अपनी समस्त आसक्तियों को त्याग कर भगवान श्रीकृष्णचन्द्र की भक्ति में स्वयं को लीन कर लिया। उनके इस त्याग और व्रत के विषय में सुन कर अत्रि, वशिष्ठ, च्यवन, अरिष्टनेमि, शारद्वान, पाराशर, अंगिरा, भृगु, परशुराम, विश्वामित्र, इन्द्रमद, उतथ्य, मेधातिथि, देवल, मैत्रेय, पिप्पलाद, गौतम, भारद्वाज, और्व, कण्डव, अगस्त्य, नारद, वेदव्यास आदि ऋषि, महर्षि और देवर्षि अपने अपने शिष्यों के साथ उनके दर्शन को पधारे।
राजा परीक्षित ने उन सभी का यथोचित समयानुकूल सत्कार करके उन्हें आसन दिया, उनके चरणों की वन्दना की और कहा – “यह मेरा परम सौभाग्य है कि आप जैस देवता तुल्य ऋषियों के दर्शन प्राप्त हुये। मैंने सत्ता के मद में चूर होकर परम तेजस्वी ब्राह्मण के प्रति अपराध किया है फिर भी आप लोगों ने मुझे दर्शन देने के लिये यहाँ तक आने का कष्ट किया यह आप लोगों की महानता है। मेरी इच्छा है कि मैं अपने जीवन के शेष सात दिनों का सदुपयोग ज्ञान प्राप्ति और भगवत्भक्ति में करूँ। अतः आप सब लोगों से मेरा निवेदन है कि आप लोग वह सुगम मार्ग बताइये जिस पर चल कर मैं भगवान को प्राप्त कर सकूँ।”
राजा परीक्षित के वचनों को सुन कर सभी अत्यंत प्रसन्न हुये और यथायोग्य उनकी इच्छा को पूर्ण करने का निश्चय कर लिया। उसी समय वहाँ पर व्यास ऋषि के पुत्र, जन्म मृत्यु से रहित परमज्ञानी श्री शुकदेव जी पधारे। समस्त ऋषियों सहित राजा परीक्षित उनके सम्मान में उठ कर खड़े हो गये और उन्हें प्रणाम किया। उसके बाद अर्ध्य, पाद्य तथा माला आदि से सूर्य के समान प्रकाशमान श्री शुकदेव जी की पूजा की और बैठने के लिये उच्चासन प्रदान किया। उनके बैठने के बाद अन्य ऋषि भी अपने अपने आसन पर बैठ गये। सभी के आसन ग्रहण करने के पश्चात् राजा परीक्षित ने मधुर वाणी मे कहा – “हे ब्रह्मरूप योगेश्वर! हे महाभाग! भगवान नारायण के सम्मुख आने से जिस प्रकार दैत्य भाग जाते हैं उसी प्रकार आपके पधारने से महान पाप भी अविलंब भाग खड़े होते हैं। आप जैसे योगेश्वर के दर्शन अत्यंत दुर्लभ है पर आपने स्वयं मेरी मृत्यु के समय पधार कर मुझ पापी को दर्शन देकर मुझे मेरे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दिया है। आप योगियों के भी गुरु हैं, आपने परम सिद्धि प्राप्त की है। अतः कृपा करके यह बताइये कि मरणासन्न प्राणी के लिये क्या कर्तव्य है? उसे किस कथा का श्रवण, किस देवता का जप, अनुष्ठान, स्मरण तथा भजन करना चाहिये और किन किन बातों का त्याग कर देना चाहिये?
समस्त ऋषियों ने राजा परीक्षित के इन प्रश्नों के पूछने के लिये साधुवाद दिया और उनके प्रश्नों के उत्तर देने के लिये महायोगी श्री शुकदेव जी से आग्रह किया। समस्त धर्मों के ज्ञाता परमज्ञानी श्री शुकदेव जी जिन्होंने नाल छेदन के समय से ही इस संसार की माया को त्याग कर परमहंस व्रत से ब्रह्मज्ञान प्राप्त किया है उनके प्रश्नों का उत्तर देने के लिये तैयार हो गये।

यदुवंश का नाश

यदुवंश का नाश

श्री शुकदेव मुनि ने कहा – “हे राजन्! अब मैं आपको संक्षेप में आपके गुरुजनों के विषय में बताता हूँ। आपके परदादा राजा धृतराष्ट्र जन्म से अन्धे थे किन्तु अपनी लोलुपता के कारण वे बुद्धि से भी अन्धे हो गये थे। अधर्मी हो जाने के कारण उनकी मति मारी गई थी। उन्होंने आपके पितामह पाण्डवों के साथ बचपन से ही दुर्व्यवहार किया। उन्हें लाक्षागृह में मार डालने का षड़यंत्र किया। भरी सभा में आपकी दादी रानी द्रौपदी के केश खींचते हुये दुःशासन को नहीं रोका। अपने पुत्रोँ की सहायता से धर्मराज युधिष्ठिर का राज्य जुआ खेलने का कपट कर के छीन लिया। और अन्त में पाँचों पाण्डवों को वनवास दे दिया।
तेरह वर्षों तक यातनाएँ भोगने के बाद जब पाण्डवों ने अपना राज्य वापस माँगा तो भी नहीं लौटाया। श्री कृष्ण, भीष्म, विदुर आदि के समझाने पर भी काल के वश में होने से तथा पुत्रमोह के कारण उसकी बुद्धि नहीं फिरी। धर्म के विरुद्ध आचरण करने के दुष्परिणामस्वरूप अन्त में दुर्योधन आदि मारे गये और कौरव वंश का विनाश हो गया।
महाभारत के इस युद्ध के से विदुर जी को, जो कि तीर्थयात्रा से लौटे थे, सन्ताप हुआ और वे पुनः तीर्थयात्रा के लिये निकल पड़े। यमुना के तट पर उनकी भेंट भगवान श्री कृष्णचन्द्र के परम भक्त और सखा उद्धव जी से हुई और विदुर जी ने उनसे भगवान श्री कृष्णचन्द्र का हाल पूछा।
रुँधे कंठ से उद्धव ने बताया – “हे विदुर जी! महाभारत के युद्ध के पश्चात् सान्तवना देने के उद्देश्य से भगवान श्री कृष्णचन्द्र जी गांधारी के पास गये। गांधारी अपने सौ पुत्रों के मृत्यु के शोक में अत्यंत व्याकुल थी। भगवान श्री कृष्णचन्द्र को देखते ही गांधारी ने क्रोधित होकर उन्हें श्राप दे दिया कि तुम्हारे कारण से जिस प्रकार से मेरे सौ पुत्रों का आपस में लड़ कर के नाश हुआ है उसी प्रकार तुम्हारे यदुवंश का भी आपस में एक दूसरे को मारने के कारण नाश हो जायेगा। भगवान श्री कृष्णचन्द्र ने माता गांधारी के उस श्राप को पूर्ण करने के लिये यादवों की मति को फेर दिया। एक दिन अहंकार के वश में आकर कुछ यदुवंशी बालकों ने दुर्वासा ऋषि का अपमान कर दिया। इस पर दुर्वासा ऋषि ने शाप दे दिया कि यादव वंश का नाश हो जाये। उनके शाप के प्रभाव से यदुवंशी पर्व के दिन प्रभास क्षेत्र में आये। पर्व के हर्ष में उन्होंने अति नशीली मदिरा पी ली और मतवाले हो कर एक दूसरे को मारने लगे। इस तरह से भगवान श्री कृष्णचन्द्र को छोड़ कर एक भी यादव जीवित न बचा। इस घटना के बाद भगवान श्री कृष्णचन्द्र महाप्रयाण कर के स्वधाम चले जाने के विचार से सोमनाथ के पास वन में एक पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ कर ध्यानस्थ हो गये। जरा नामक एक बहेलिये ने भूलवश उन्हें हिरण समझ कर विषयुक्त बाण चला दिया जो के उनके पैर के तलुवे में जाकर लगा और भगवान श्री कृष्णचन्द्र स्वधाम को पधार गये।
“हे विदुर जी। भगवान श्री कृष्णचन्द्र रूपी सूर्य अस्त हो गये। उनकी लीलाओं का स्मरण करके मैं व्याकुल हो जाता हूँ। उन्होंने पूतना जैसी राक्षसी का संहार किया। कालिदह के नाग को नाथ कर यमुना के विषयुक्त जल को शुद्ध किया। गुरु सांदीपन से शिक्षा लेकर अल्पकाल में ही सांगोपांग वेदों को कंठस्थ कर लिया तथा गुरुदक्षिणा के रूप में उनके मृत पुत्रों को यमलोक से लाकर गुरु को प्रदान किया। कंस को मार कर अपने पिता वसुदेव जी को बन्धन मुक्त किया। अपने भक्तों को परमगति देने के साथ ही साथ शिशुपाल, कंस, जरासन्ध जैसे अपने शत्रुओं को भी परमगति प्रदान की। अपने बड़े भ्राता बलराम के साथ जरासन्ध को उसकी सत्रह अक्षौहिणी सेना सहित सत्रह बार परास्त किया। रुक्म को हरा कर उसकी बहन रुक्मिणी को हर कर ले आये। सात बिना नथे वृषभों को नाथ कर नाग्जिती से स्वयंवर किया। जाम्बवन्त को जीत कर जाम्बन्ती को अपनी पटरानी बनाया। सत्यभामा की प्रसन्नता के लिये इन्द्र का मान मर्दन कर पारिजात वृक्ष और सुधर्मा सभा को द्वारिका में ले आये। धर्म की रक्षा के लिये भौमासुर को मार कर उसकी सोलह सहस्त्र एक सौ कन्याओं को अपनी रानी बनाया और अपनी योगमाया से उतने ही रूप धारण कर उनसे विहार किया। उनसे अपने ही समान दस पुत्र उत्पन्न किये। महाभारत का युद्ध रचा कर स्वयं बिना अस्त्र धारण किये ही पाण्डवों के द्वारा अठारह अक्षौहिणी सेना का संहार करवा दिया। वे ही भगवान श्री कृष्णचन्द्र आज इस भूमण्डल से अन्तर्ध्यान हो गये।”

दिति का गर्भधारण

दिति का गर्भधारण

एक बार मरीचि नन्दन कश्यप जी ने भगवान को प्रसन्न करने के लिये खीर की आहुति दिया और उनकी आराधना समाप्त करके सन्ध्या काल के समय अग्निशाला में ध्यानस्थ होकर बैठे गये। उसी समय दक्ष प्रजापति की पुत्री दिति कामातुर होकर पुत्र प्राप्ति की लालसा से कश्यप जी के निकट गई। दिति ने कश्यप जी से मीठे वचनों से अपने साथ रमण करने के लिये प्रार्थना किया। इस पर कश्यप जी ने कहा, “हे प्रिये! मैं तुम्हें तुम्हारी इच्छानुसार तेजस्वी पुत्र अवश्य दूँगा। किन्तु तुम्हें एक प्रहर के लिये प्रतीक्षा करनी होगी। सन्ध्या काल में सूर्यास्त के पश्चात् भूतनाथ भगवान शंकर अपने भूत, प्रेत, राक्षस तथा यक्षों को लेकर बैल पर चढ़ कर विचरते हैं। इस समय तुम्हें कामक्रीड़ा में रत देख कर वे अप्रसन्न हो जावेंगे। अतः यह समय सन्तानोत्पत्ति के लिये उचित नहीं है। सारा संसार मेरी निन्दा करेगा। यह समय तो सन्ध्यावन्दन और भगवत् पूजन आदि के लिये ही है। इस समय जो पिशाचों जैसा आचरण करते हैं वे नरकगामी होते हैं।”
पति के इस प्रकार समझाने पर भी उसे कुछ भी समझ में न आया और उस कामातुर दिति ने निर्लज्ज भाव से कश्यप जी के वस्त्र पकड़ लिये। इस पर कश्यप जी ने दैव इच्छा को प्रबल समझ कर दैव को नमस्कार किया और दिति की इच्छा पूर्ण की और उसके बाद शुद्ध जल से स्नान कर के सनातन ब्रह्म रूप गायत्री का जप करने लगे। दिति ने गर्भ धारण कर के कश्यप जी से प्रार्थना की, “हे आर्यपुत्र! भगवान भूतनाथ मेरे अपराध को क्षमा करें और मेरा यह गर्भ नष्ट न करें। उनका स्वभाव बड़ा उग्र है। किन्तु वे अपने भक्तों की सदा रक्षा करते हैं। वे मेरे बहनोई हैं मैं उन्हें नमस्कार करती हूँ।”
प्रजापति कश्यप जब सन्ध्यावन्दन आदि से निवृत हुये तो उन्होंने अपनी पत्नी को अपनी सन्तान के हित के लिये प्रार्थना करते हुये और थर थर काँपती हुई देखा तो वे बोले, “हे दिति! तुमने मेरी बात नहीं मानी। तुम्हारा चित्त काम वासना में लिप्त था। तुमने असमय में भोग किया है। तुम्हारे कोख से महा भयंकर अमंगलकारी दो अधम पुत्र उत्पन्न होंगे। सम्पूर्ण लोकों के निरपराध प्राणियों को अपने अत्याचारों से कष्ट देंगे। धर्म का नाश करेंगे। साधू और स्त्रियों को सतायेंगे। उनके पापों का घड़ा भर जाने पर भगवान कुपित हो कर उनका वध करेंगे।”
दिति ने कहा, “हे भगवन्! मेरी भी यही इच्छा है कि मेरे पुत्रों का वध भगवान के हाथ से ही हो। ब्राह्मण के शाप से न हो क्योंकि ब्राह्मण के शाप के द्वारा प्राणी नरक में जाकर जन्म धारण करता है।” तब कश्यप जी बोले, “हे देवि! तुम्हें अपने कर्म का अति पश्चाताप है इस लिये तुम्हारा नाती भगवान का बहुत बड़ा भक्त होगा और तुम्हारे यश को उज्वल करेगा। वह बालक साधुजनों की सेवा करेगा और काल को जीत कर भगवान का पार्षद बनेगा।”
कश्यप जी के मुख से भगवद्भक्त पौत्र के उत्पन्न होने की बात सुन कर दिति को अति प्रसन्नता हुई और अपने पुत्रों का वध साक्षात् भगवान से सुन कर उस का सारा खेद समाप्त हो गया।

जय और विजय को शाप

जय और विजय को शाप

एक बार सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार (ये चारों सनकादिक ऋषि कहलाते हैं और देवताओं के पूर्वज माने जाते हैं) सम्पूर्ण लोकों से विरक्त होकर चित्त की शान्ति के लिये भगवान विष्णु के दर्शन करने हेतु उनके बैकुण्ठ लोक में गये। बैकुण्ठ के द्वार पर जय और विजय नाम के दो द्वारपाल पहरा दिया करते थे। जय और विजय ने इन सनकादिक ऋषियों को द्वार पर ही रोक लिया और बैकुण्ठ लोक के भीतर जाने से मना करने लगे।
उनके इस प्रकार मना करने पर सनकादिक ऋषियों ने कहा, “अरे मूर्खों! हम तो भगवान विष्णु के परम भक्त हैं। हमारी गति कहीं भी नहीं रुकती है। हम देवाधिदेव के दर्शन करना चाहते हैं। तुम हमें उनके दर्शनों से क्यों रोकते हो? तुम लोग तो भगवान की सेवा में रहते हो, तुम्हें तो उन्हीं के समान समदर्शी होना चाहिये। भगवान का स्वभाव परम शान्तिमय है, तुम्हारा स्वभाव भी वैसा ही होना चाहिये। हमें भगवान विष्णु के दर्शन के लिये जाने दो।” ऋषियों के इस प्रकार कहने पर भी जय और विजय उन्हें बैकुण्ठ के अन्दर जाने से रोकने लगे। जय और विजय के इस प्रकार रोकने पर सनकादिक ऋषियों ने क्रुद्ध होकर कहा, “भगवान विष्णु के समीप रहने के बाद भी तुम लोगों में अहंकार आ गया है और अहंकारी का वास बैकुण्ठ में नहीं हो सकता। इसलिये हम तुम्हें शाप देते हैं कि तुम लोग पापयोनि में जाओ और अपने पाप का फल भुगतो।” उनके इस प्रकार शाप देने पर जय और विजय भयभीत होकर उनके चरणों में गिर पड़े और क्षमा माँगने लगे।
यह जान कर कि सनकादिक ऋषिगण भेंट करने आये हैं भगवान विष्णु स्वयं लक्ष्मी जी एवं अपने समस्त पार्षदों के साथ उनके स्वागत के लिय पधारे। भगवान विष्णु ने उनसे कहा, “हे मुनीश्वरों! ये जय और विजय नाम के मेरे पार्षद हैं। इन दोनों ने अहंकार बुद्धि को धारण कर आपका अपमान करके अपराध किया है। आप लोग मेरे प्रिय भक्त हैं और इन्होंने आपकी अवज्ञा करके मेरी भी अवज्ञा की है। इनको शाप देकर आपने उत्तम कार्य किया है। इन अनुचरों ने ब्रह्मणों का तिरस्कार किया है और उसे मैं अपना ही तिरस्कार मानता हूँ। मैं इन पार्षदों की ओर से क्षमा याचना करता हूँ। सेवकों का अपराध होने पर भी संसार स्वामी का ही अपराध मानता है। अतः मैं आप लोगों की प्रसन्नता की भिक्षा चाहता हूँ।”
भगवान के इन मधुर वचनों से सनकादिक ऋषियों का क्रोध तत्काल शान्त हो गया। भगवान की इस उदारता से वे अति अनन्दित हुये और बोले, “आप धर्म की मर्यादा रखने के लिये ही ब्राह्मणों को इतना आदर देते हैं। हे नाथ! हमने इन निरपराध पार्षदों को क्रोध के वश में होकर शाप दे दिया है इसके लिये हम क्षमा चाहते हैं। आप उचित समझें तो इन द्वारपालों को क्षमा करके हमारे शाप से मुक्त कर सकते हैं।”
भगवान विष्णु ने कहा, “हे मुनिगणों! मै सर्वशक्तिमान होने के बाद भी ब्राह्मणों के वचन को असत्य नहीं करना चाहता क्योंकि इससे धर्म का उल्लंघन होता है। आपने जो शाप दिया है वह मेरी ही प्रेरणा से हुआ है। ये अवश्य ही इस दण्ड के भागी हैं। ये दिति के गर्भ में जाकर दैत्य योनि को प्राप्त करेंगे और मेरे द्वारा इनका संहार होगा। ये मुझसे शत्रुभाव रखते हुये भी मेरे ही ध्यान में लीन रहेंगे। मेरे द्वारा इनका संहार होने के बाद ये पुनः इस धाम में वापस आ जावेंगे।”

कर्दम ऋषि और देवहूति का विवाह

कर्दम ऋषि और देवहूति का विवाह

ब्रह्मा जी ने कर्दम ऋषि को सन्तान उत्पन्न कर प्रजा में वृद्धि करने की आज्ञा दी। उनकी आज्ञा का पालन करने के लिये कर्दम ऋषि ने अर्द्धांगिनी प्राप्ति की कामना से भगवान की घोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने कर्दम ऋषि को अपने विराट रूप में दर्शन देकर कहा, “हे कर्दम! तुमने नियम संयम से मेरा तप किया है। तुम्हारी मनोकामना शीघ्र पूर्ण होगी। ब्रह्मा के पुत्र स्वयंभुव मनु की पत्नी शतरूपा के गर्भ से देवहूति नाम की कन्या उत्पन्न हुई है जो अब युवा हो गई है। देवहूति यौवन, शील और गुणों में अद्वितीय है। वही तुम्हारे योग्य भार्या है। तुम उससे विवाह कर के सन्तान उत्पन्न करो। उस पत्नी से तुम्हारी नौ कन्याएँ उत्पन्न होंगी। उन कन्याओं की उत्पत्ति के पश्चात् मैं स्वयं तुम्हारे पुत्र के रूप में अवतार लूँगा।” इस प्रकार कर्दम ऋषि को वरदान दे कर भगवान अपने लोक को चले गये।
कर्दम ऋषि काल की प्रतीक्षा में वहीं सरस्वती नदी के तट पर आश्रम बना कर रहने लगे। कुछ काल व्यतीत होने पर स्वयंभुव मनु अपनी पत्नी शतरूपा और कन्या देवहूति के साथ उनके आश्रम में पधारे। उस समय कर्दम ऋषि आग्निहोत्र के निवृत होकर बैठे थे। उग्र तपस्या के कारण उनका तेज देदीप्यामान हो रहा था। उनका शरीर लम्बा, नेत्र कमल के समान सुन्दर, सिर पर जटायें व कमर में चीर शोभायमान हो रहा था। मनु ने कर्दम ऋषि को प्रणाम किया तथा कर्दम जी के द्वारा उचित स्वागत सत्कार पाकर प्रसन्न हुये।
मनु ने कर्दम ऋषि से कहा, “हे मुनिश्रेष्ठ! आपने तप, विद्या तथा योग के द्वारा अपूर्व आत्मबल और ब्रह्मतेज प्राप्त किया है। अब आपने ब्रह्मचर्य अवस्था पूर्ण कर ली है। नारद जी ने आपके विषय में मेरी कन्या देवहूति को बताया है। वह कन्या आपसे विवाह करने की कामना रखती है। देवहूति अपने शील और गुणों में अद्वितीय है। मैं आपसे विनय करता हूँ कि आप मेरी कन्या देवहूति से पाणिग्रहण करें। हे ब्रह्मदेव! मैं अपनी यह सुन्दर कन्या श्रद्धा पूर्वक आपको अर्पण करता हूँ।”
इस प्रकार कर्दम ऋषि और देवहूति का विवाह हो गया। उनकी कला, अनुसुइया, श्रद्धा, हविर्भू, गति, क्रिया, ख्याति, अरुन्धती और शान्ति नामक नौ कन्याएँ उत्पन्न हुईं। नौ कन्याओं के उत्पन्न होने के बाद भगवान ने अपने वचनानुसार कपिल मुनि के रूप में देवहूति के गर्भ से अवतार लिया।
युवा होने पर कला का मरीचि के साथ, अनुसुइया का अंगिरा के साथ, हविर्भू का पुलस्त्य के साथ, गति का पुलह के साथ, क्रिया का ऋतु के साथ, ख्याति का भृगु के साथ, अरुन्धती का वशिष्ठ के साथ और शान्ति का अथर्व के साथ विवाह हुआ। इस प्रकार पृथ्वी में ब्रह्मा जी के प्रजाजनों में वृद्धि होती चली गई।

सती का आत्मदाह

सती का आत्मदाह

दक्ष प्रजापति एवं शंकर जी में परस्पर बैर बढ़ता गया। कुछ काल पश्चात् ब्रह्मा जी ने दक्ष को सभी प्रजापतियों का स्वामी बना दिया। जिससे दक्ष का गर्व और भी बढ़ गया। उसने एक बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया। दक्ष ने उस यज्ञ में सभी देवर्षि, ब्रह्मर्षि, ब्रह्मनिष्ठ महापुरुषों, देवताओं आदि को निमन्त्रित किया। केवल शंकर जी को बुलावा नहीं भेजा गया। सभी देवता पितर आदि ने अपनी-अपनी गृहणियों के सहित अपने-अपने विमानों में बैठ कर यज्ञ में प्रस्थान किया। आकाश में विमानों को जाते हुये देखकर दक्ष प्रजापति की पुत्री सती ने महादेव जी से कहा, “हे देवाधिदेव! मैंने सुना है कि मेरे पिता ने एक बड़े भारी यज्ञ का आयोजन किया है। मुझे प्रतीत होता है कि ये देवता, यज्ञ, गन्धर्व आदि अपनी अपनी पत्नियों सहित सज धज कर तथा विमानों में बैठ कर वहीं के लिये प्रस्थान कर रहे हैं। वहाँ पर मेरी बहनें भी अपने अपने पतियों के साथ अवश्य पधारी होंगी। मेरी इच्छा है कि मैं भी आपके साथ यज्ञ में जा कर अपने पिता के यज्ञ की शोभा बढ़ाऊँ।”
महादेव जी बोले, “हे प्रिये! तुमने बहुत अच्छी बात कही है। तुम्हारे पिता ने तुम्हारी सभी बहनों को निमन्त्रित किया है किन्तु बैर भाव के कारण मेरे साथ तुम्हें भी न्यौता नहीं दिया। ऐसी स्थिति में वहाँ जाना उचित नहीं है।” इस पर सती जी बोलीं, “हे प्राणनाथ! पति, गुरु, माता-पिता तथा इष्ट मित्रों के यहाँ तो बिना बुलाये भी जाया जा सकता है।” सती जी के ऐसा कहने पर शिव जी ने हँस कर कहा, “हे प्रिये! तुम्हारा कथन सत्य है कि पति, गुरु, माता-पिता तथा इष्ट मित्रों के यहाँ तो बिना बुलाये भी जाया जा सकता है। किन्तु यह तभी हो सकता है जब उनसे कोई द्वेष भाव न हो। तुम्हारे पिता को अति अभिमान है इसलिये वहाँ जाने पर वे तुम्हारा निरादर कर सकते हैं।” सती के मन में अपने पिता के यहाँ जाने की प्रबल इच्छा थी इसलिये उन्हें शिव जी की बातों से वे अति उदास हो गईं। सती की अपने पिता दक्ष प्रजापति के यहाँ जाने की प्रबल इच्छा को देख कर शंकर जी ने विचार किया कि यदि सती को न जाने दिया जायेगा तो यह प्राण त्याग देंगी और जाने पर भी प्राण त्यागने की सम्भावना है। अतः शंकर जी ने इसे काल की गति मानकर और होनहार को प्रबल समझकर अपने हजारों सेवक तथा वाहनों समेत सती को दक्ष के यहाँ भेज दिया।
कुछ ही काल में सती अपने पिता के यज्ञस्थल में पहुँच गईं। वहाँ पर वेदज्ञ ब्राह्मण उच्च स्वरों में वेद की ऋचाओं का पाठ कर रहे थे। यज्ञस्थल की शोभा अद्वितीय थी। सती को देख कर उनकी माता और बहनें प्रसन्न हुईं किन्तु दक्ष प्रजापति ने सती को देखते ही कुदृष्टि करके मुँह फेर लिया। सती अपने इस अपमान को सह न सकीं। जब सती ने यज्ञ मण्डप में जाकर यह देखा कि उनके पति महादेव जी को यज्ञ में कोई भाग नहीं दिया गया है ति उन्हें अति क्रोध आया। दक्ष के इस अभिमान तथा शिव जी के के साथ किये गये द्वेष भाव को वे और अधिक सह न सकीं। वे यज्ञ में अपने पिता के पास आकर बोलीं, “हे पिता! इस संसार में भगवान शंकर से बढ़कर कोई देवता नहीं है। इसीलिये उन्हें देवाधिदेव महादेव कहते हैं। वे मेरे पति हैं और आपने समस्त देवताओं, ऋषि-महर्षियों आदि के समक्ष यज्ञ में उनका भाग न देकर उनकी निन्दा की है। अपने स्वामी की निन्दा देख-सुन कर मैं कदापि जीवित नहीं रह सकती। अब मैं आपसे उत्पन्न इस शरीर को त्याग दूँगी क्योंकि आप के रक्त से बना यह शरीर अपवित्र है।”
इतना कह कर सती मौन हो उत्तर दिशा की ओर मुँह करके बैठ गईं। आचमन से अपने अन्तःकरण को शुद्ध करके पीत वस्त्र से शरीर को ढँक लिया। नेत्र बन्द करके प्रणायाम द्वारा प्राण और अपान वायु को एक करके नाभिचक्र में स्थापित किया। तत्पश्चात् उदान वायु को नाभिचक्र से ऊपर ले जाकर शनैः शनैः हृदयचक्र में बुद्धि के साथ स्थित किया। फिर उदान वायु को ऊपर उठाकर कण्ठ मार्ग से भृकुटियों के मध्य स्थापित कर लिया। इसके बाद भगवान शंकर के चरणों में अपना ध्यान लगा कर योग मार्ग के द्वारा वायु तथा अग्नि तत्व को धारण करके अपने शरीर को अपने ही तेज से भस्म कर दिया। सती के इस प्रकार देह त्याग पर सम्पूर्ण उपस्थित देवता, ऋषि-महर्षि आदि सभी ने दक्ष को बुरा भला कहा। शंकर जी का द्रोही होने के कारण उसका अपयश होने लगा।
सती के साथ आये हुये हुये शिव जी के गण यज्ञ का विध्वंश करने लगे। यज्ञ का विध्वंश देख कर भृगु ऋषि ने उस यज्ञ की रक्षा की।