बन्दा सिंह बहादुर
*part 1
1. जन्म जत्थेदार बन्दा सिंह बहादुर*
बन्दा सिँघ बहादुर जी का जन्म 16 अक्टूबर 1670 ई को जम्मू-कश्मीर के पुँछ जिले के एक गाँव रजौरी में हुआ। उनके बचपन का नाम लछमन दास था। आपके पिता रामदेव स्थानीय जमींदार थे। जिस कारण आपके पास धन-सम्पदा का अभाव न था। आपने अपने बेटे लछमन दास को रिवाज़ के अनुसार घुड़सवारी, शिकार खेलना, कुश्तियाँ आदि के करतब सिखलाए किन्तु शिक्षा पर विशेष ध्यान नहीं दिया।
अभी लछमन दास का बचपन समाप्त ही हुआ था और यौवन में पदार्पण ही किया था कि अचानक एक घटना उनके जीवन में असाधारण परिवर्तन ले आई। एक बार उन्होंने एक हिरनी का शिकार किया। जिसके पेट में से दो बच्चे निकले और तड़प कर मर गये। इस घटना ने लछमनदास के मन पर गहरा प्रभाव डाला और वह अशाँत से रहने लगे। मानसिक तनाव से छुटकारा पाने के लिए वह साधु संगत करने लगे।
एक बार जानकी प्रसाद नामक साधु राजौरी में आया। लछमनदास ने उसके समक्ष अपने मन की व्यथा बताई तो जानकी प्रसाद उसे अपने सँग लाहौर नगर के आश्रम में ले आया। और उसने लछमन दास का नाम माधो दास रख दिया। क्योंकि जानकी दास को भय था कि जमींदार रामदेव अपने पुत्र को खोजता यहाँ न आ जाए।
किन्तु लछमन दास अथवा माधो दास के मन का भटकना समाप्त नहीं हुआ। अतः वह शान्ति की खोज में जुटा रहा। लाहौर नगर के निकट कसूर क्षेत्र में सन 1686 ईसवी की वैसाखी के मेले पर उन्होंने एक और साधु रामदास को अपना गुरू धारण किया और वह उस साधु के साथ दक्षिण भारत की यात्रा पर चले गये। बहुत से तीर्थों की यात्रा की किन्तु शाश्वत ज्ञान कहीं प्राप्त न हुआ।
इस बीच पँचवटी में उसकी मुलाकात एक योगी औघड़नाथ के साथ हुई। यह योगी ऋद्धियों-सिद्धि
यों तथा ताँत्रिक विद्या जानने के कारण बहुत प्रसिद्ध था। तँत्र-मँत्र तथा योग विद्या सीखने की भावना से माधोदास ने इस योगी की खूब सेवा की। जिससे प्रसन्न होकर औघड़ नाथ ने योग की गूढ़ साधनाएँ व जादू के भेद उसको सिखा दिये। योगी की मृत्यु के पश्चात् माधेदास ने गोदावरी नदी के तट पर नांदेड़ नगर में एक रमणीक स्थल पर अपना नया आश्रम बनाया।
यहाँ माधोदास ने ऋद्धि-सिद्धि अथवा जन्त्र-मन्त्र की चमत्कारी शक्तियाँ दिखाकर जनसाधारण को प्रभावित किया। जिससे स्थानीय लोग उन्हें मानने लगे और कुछ एक उनके शिष्य बन गये। जिससे माधेदास अभिमानी हो गया। वह प्रत्येक कार्य अपने स्वार्थ के लिए करने लगा। वह परोपकार का मार्ग भूल गया।
अतः वह लोक भलाई के लिए कुछ भी न कर पाया बल्कि अपनी आत्मिक शक्ति का प्रदर्शन करके लोगों को भयभीत करने लगा जिससे लोग अभिशाप के भय से धन अथवा आवश्यक सामग्री इत्यादि आश्रम में पहुँचाने लगे। यदि कोई अन्य साधु इस क्षेत्र में आता तो माधोदास उसका अपमान करके उसे वहाँ से भगा देता। इस बात की चर्चा दूर दूर तक होने लगी कि माधेदास तपस्वी अभिमानी और हठी प्रवृत्ति का है, वह अन्य सन्तों की खिल्ली उड़ाता है।
गुरू गोबिन्द सिंघ जी ने इस चुनौती को स्वीकार किया और उसके आश्रम में जाकर उसे ललकारने के विचार से आश्रम की मर्यादा के विपरीत अपने शिष्यों को कार्य करने का आदेश दिया। .
sukhsaagar
श्री राम ज्योतिष कार्यालय जींद
शनिवार, 25 जून 2016
बन्दा सिंह बहादुर *part 1
शुक्रवार, 24 जून 2016
बजरंगबली कैसे बने पंचमुखी हनुमान..
बजरंगबली कैसे बने पंचमुखी हनुमान...पढ़ें पौराणिक कथा
जानें पंचमुखी हनुमान की पौराणिक कथा
जब राम और रावण की सेना के मध्य भयंकर युद्ध चल रहा था और रावण अपने पराजय के समीप था तब इस समस्या से उबरने के लिए उसने अपने मायावी भाई अहिरावन को याद किया जो मां भवानी का परम भक्त होने के साथ साथ तंत्र मंत्र का का बड़ा ज्ञाता था। उसने अपने माया के दम पर भगवान राम की सारी सेना को निद्रा में डाल दिया तथा राम एव लक्ष्मण का अपरहण कर उनकी देने उन्हें पाताल लोक ले गया।
कुछ घंटे बाद जब माया का प्रभाव कम हुआ तब विभिषण ने यह पहचान लिया कि यह कार्य अहिरावन का है और उसने हनुमानजी को श्री राम और लक्ष्मण सहायता करने के लिए पाताल लोक जाने को कहा। पाताल लोक के द्वार पर उन्हें उनका पुत्र मकरध्वज मिला और युद्ध में उसे हराने के बाद बंधक श्री राम और लक्ष्मण से मिले।
वहां पांच दीपक उन्हें पांच जगह पर पांच दिशाओं में मिले जिसे अहिरावण ने मां भवानी के लिए जलाए थे। इन पांचों दीपक को एक साथ बुझाने पर अहिरावन का वध हो जाएगा इसी कारण हनुमान जी ने पंचमुखी रूप धरा।
उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण दिशा में नरसिंह मुख, पश्चिम में गरुड़ मुख, आकाश की तरफ हयग्रीव मुख एवं पूर्व दिशा में हनुमान मुख। इस रूप को धरकर उन्होंने वे पांचों दीप बुझाए तथा अहिरावण का वध कर राम,लक्ष्मण को उस से मुक्त किया।
इसी प्रसंग में हमें एक दूसरी कथा भी मिलती है कि जब मरियल नाम का दानव भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र चुराता है और यह बात जब हनुमान को पता लगती है तो वह संकल्प लेते हैं कि वे चक्र पुनः प्राप्त कर भगवान विष्णु को सौप देंगे।
मरियल दानव इच्छानुसार रूप बदलने में माहिर था अत: विष्णु भगवान ने हनुमानजी को आशीर्वाद दिया, साथ ही इच्छानुसार वायुगमन की शक्ति के साथ गरुड़-मुख, भय उत्पन्न करने वाला नरसिंह-मुख, हयग्रीव मुख ज्ञान प्राप्त करने के लिए तथा वराह मुख सुख व समृद्धि के लिए था। पार्वती जी ने उन्हें कमल पुष्प एवं यम-धर्मराज ने उन्हें पाश नामक अस्त्र प्रदान किया। आशीर्वाद एवं इन सबकी शक्तियों के साथ हनुमान जी मरियल पर विजय प्राप्त करने में सफल रहे। तभी से उनके इस पंचमुखी स्वरूप को भी मान्यता प्राप्त हुई।
मंगलवार, 7 जून 2016
पांडवों व द्रौपदी की मृत्यु, क्या हुआ था स्वर्ग जाने के रास्ते में?
कैसे हुई पांडवों व द्रौपदी की मृत्यु, क्या हुआ था स्वर्ग जाने के रास्ते में?
पांडव जब स्वर्ग जाने के लिए निकले तो रास्ते में ही द्रौपदी सहित भीम, अर्जुन, नकुल व सहदेव की मृत्यु हो गई। सिर्फ युधिष्ठिर ही सशरीर स्वर्ग जा पाए। ये बात हम सभी जानते हैं। लेकिन युधिष्ठिर के अलावा अन्य पांडवों व द्रौपदी की मृत्यु क्यों हुई, ये बात बहुत कम लोगों को पता है। आज हम आपको बता रहे हैं युधिष्ठिर कैसे पहुंचे सशरीर स्वर्ग और रास्ते में ही क्यों हो गई द्रौपदी व अन्य पांडवों की मृत्यु?
ऐसे शुरू की पांडवों ने स्वर्ग जाने की यात्रा
भगवान श्रीकृष्ण की मृत्यु के बाद महर्षि वेदव्यास की बात मानकर द्रौपदी सहित पांडवों ने राज-पाठ त्याग कर सशरीर स्वर्ग जाने का निश्चय किया। युधिष्ठिर ने परीक्षित का राज्याभिषेक कर दिया। इसके बाद पांडवों व द्रौपदी ने साधुओं के वस्त्र धारण किए और स्वर्ग जाने के लिए निकल पड़े। पांडवों के साथ-साथ एक कुत्ता भी चलने लगा। पांडवों ने पृथ्वी की परिक्रमा पूरी करने की इच्छा से उत्तर दिशा की ओर यात्रा की। यात्रा करते-करते पांडव हिमालय तक पहुंच गए। हिमालय लांघ कर पांडव आगे बढ़े तो उन्हें बालू का समुद्र दिखाई पड़ा। इसके बाद उन्होंने सुमेरु पर्वत के दर्शन किए।
सबसे पहले द्रौपदी का हुआ पतन
पांचों पांडव, द्रौपदी तथा वह कुत्ता जब सुमेरु पर्वत पर चढ़ रहे थे, तभी द्रौपदी लड़खड़ाकर गिर पड़ी। द्रौपदी को गिरा देख भीम ने युधिष्ठिर से कहा कि- द्रौपदी ने कभी कोई पाप नहीं किया। तो फिर क्या कारण है कि वह नीचे गिर पड़ी? युधिष्ठिर ने कहा कि- द्रौपदी हम सभी में अर्जुन को अधिक प्रेम करती थीं। इसलिए उसके साथ ऐसा हुआ है। ऐसा कहकर युधिष्ठिर द्रौपदी को देखे बिना ही आगे बढ़ गए।
फिर गिरे सहदेव
द्रौपदी के गिरने के थोड़ी देर बाद सहदेव भी गिर पड़े। भीम ने सहदेव के गिरने का कारण पूछा तो युधिष्ठिर ने बताया कि सहदेव किसी को अपने जैसा विद्वान नहीं समझता था, इसी दोष के कारण इसे आज गिरना पड़ा है।
ऐसे हुई नकुल की मृत्यु
द्रौपदी व सहदेव के बाद चलते-चलते नकुल भी गिर पड़े। भीम ने जब युधिष्ठिर से इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि नकुल को अपने रूप पर बहुत अभिमान था। वह किसी को अपने समान रूपवान नहीं समझता था। इसलिए आज इसकी यह गति हुई है।
ये था अर्जुन के पतन का कारण
युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन व वह कुत्ता जब आगे चल रहे थे, तभी थोड़ी देर बाद अर्जुन भी गिर पड़े। युधिष्ठिर ने भीम को बताया कि अर्जुन को अपने पराक्रम पर बहुत अभिमान था। इसने कहा थी कि मैं एक ही दिन में शत्रुओं का नाश कर दूंगा, लेकिन ऐसा किया नहीं। अपने अभिमान के कारण ही अर्जुन की आज यह हालत हुई है। ऐसा कहकर युधिष्ठिर आगे बढ़ गए।
इसलिए हुआ का भीम पतन
थोड़ी आगे चलने पर भीम भी गिर गए। तब भीम ने युधिष्ठिर को पुकार कर पूछा कि- हे राजन यदि आप जानते हैं तो मेरे पतन का कारण बताईए? तब युधिष्ठिर ने बताया कि तुम खाते बहुत थे और अपने बल का झूठा प्रदर्शन करते थे। इसलिए तुम्हें आज भूमि पर गिरना पड़ा है। यह कहकर युधिष्ठिर आगे चल दिए। केवल वह कुत्ता ही उनके साथ चलता रहा।
सशरीर स्वर्ग गए थे युधिष्ठिर
युधिष्ठिर कुछ ही दूर चले थे कि उन्हें स्वर्ग ले जाने के लिए स्वयं देवराज इंद्र अपना रथ लेकर आ गए। तब युधिष्ठिर ने इंद्र से कहा कि- मेरे भाई और द्रौपदी मार्ग में ही गिर पड़े हैं। वे भी हमारे हमारे साथ चलें, ऐसी व्यवस्था कीजिए। तब इंद्र ने कहा कि वे सभी पहले ही स्वर्ग पहुंच चुके हैं। वे शरीर त्याग कर स्वर्ग पहुंचे हैं और आप सशरीर स्वर्ग में जाएंगे।
यमराज ने लिया था कुत्ते का रूप
इंद्र की बात सुनकर युधिष्ठिर ने कहा कि यह कुत्ता मेरा परम भक्त है। इसलिए इसे भी मेरे साथ स्वर्ग जाने की आज्ञा दीजिए, लेकिन इंद्र ने ऐसा करने से मना कर दिया। काफी देर समझाने पर भी जब युधिष्ठिर बिना कुत्ते के स्वर्ग जाने के लिए नहीं माने तो कुत्ते के रूप में यमराज अपने वास्तविक स्वरूप में आ गए (वह कुत्ता वास्तव में यमराज का ही रूप था)। युधिष्ठिर को अपने धर्म में स्थित देखकर यमराज बहुत प्रसन्न हुए। इसके बाद देवराज इंद्र युधिष्ठिर को अपने रथ में बैठाकर सशरीर स्वर्ग ले गए।
रविवार, 10 अप्रैल 2016
श्रीकृष्ण व सुदामा की कथा
श्रीकृष्ण व सुदामा की कथा
सुदामा एक अत्यंत दीन ब्राह्मण थे । बालकपन में उसी गुरु के पास विद्याध्ययन करने गये थे जहां भगवान श्रीकृष्ण चंद्र अपने जेठे भाई बलराम जी के साथ शिक्षा ग्रहण करने के लिए गये थे । वहां श्रीकृष्ण चंद्र के साथ इनका खूब संग रहा । इन्होंने गुरुजी की बड़ी सेवा की । गुरुपत्नी की आज्ञा से एक बार सुदामा कृष्णचंद्र के साथ जंगल से लकड़ी लाने गये । जंगल में जाना था कि आंधी - पानी आ गया । अंधकार इतना सघन छा गया कि अपना हाथ अपनी आंखों नहीं दिखता था । रातभर ये लोग उस अंधेरी रात में वन - वन भटकते रहे परंतु रास्ता मिला ही नहीं । प्रात:काल सहृदय सांदीपनि गुरु इन्हें खोजते जंगल में आये और घर ले गये ।
गुरुगृह से आने पर सुदामा ने एक सती ब्राह्मण कन्या से विवाह किया । सुदामा की पत्नी थी बड़ी पतिव्रता अनुपम साध्वी । उसे किसी बात का कष्ट न था, चिंता न थी, यदि थी तो केवल अपने पतिदेव की दरिद्रता की । वह जानती थी भगवान श्रीकृष्ण उसके पति के प्राचीन सखा हैं - गुरुकुल के सहाध्यायी हैं । वह सुदामा डी को इसकी समय - समय पर चेतावनी भी दिया करती थी, परंतु सुदामा जी इसे तनिक भी कान नहीं करते - कभी ध्यान नहीं देते थे । एक बार उस पतिव्रता ने सुदामा जी से मिलिए, उन्हें अपना दु:ख सुनाइये । भगवान दयासागर हैं, हमारा दु:ख अवस्य दूर करेंगे । जरा हमारी इस दीन हीन दशा की खबर अपने प्यारे सखा कृष्ण को तो देना - ‘या घरते न गयो कबहूं पिय टूटो तवा अरु फूटी कठौती’ ।
सुदामा जी केवल भाग्य को कोसा करते थे, परंतु इस बार उस साध्वी के सच्चे हृदय से निकली प्रार्थना काम कर गयी । सुदामा जी द्वारकाधीश के पास जाने के लिए तैयार हो गये । उपायन के तौर पर इधर उधर से मांगकर पत्नी ने चावल की पोटली पतिदेव के हवाले की । सुदामा जी पोटली को बगल में दबाये द्वारका के लिए रवाना हुए परंतु बड़े अचंभे की बात यह हुई कि जो द्वारका सुदामा की कुटिया से कोसों दूर थी वह सामने दिखने लगी - उसके सुवर्ण जटित प्रासाद आंखों को चकाचौंध करने लगे । झट से सुदामा जी द्वारका पहुंच गये ।
पूछते - पूछते भगवान के द्वार पहुंचे । द्वारपाल को अपना परिचय दिया । भगवान के दरबार में भला दीन दुखी को कौन रोक सकता है ? द्वारपाल झट से श्रीकृष्ण के पास सुदामा जी के आगमन की सूचना नरोत्तमदास जी के शब्दों में यों देने गया -
भगवान ने अपने पुराने मित्र को पहचान लिया । वे स्वयं आकर सुदामा को महल में ले गये । रत्नजटित सिंहासन पर बैठाया, अपने हाथों से उनका पांव पखारा, प्राचीन विद्यार्थी जीवन की स्मृति दिलायी और भक्ति के साथ लाये हुए भाभी के द्वारा अर्पित चावलों की एक मुट्ठी अपने मुंह में डाली, दूसरी मुट्ठी के समय रुक्मिणी ने उन्हें रोक दिया । सुदामा भगवान के महल में कई दिनों तक सुखपूर्वक रहे, श्रीकृष्ण ने बड़े प्रेम से उन्हें विदा किया ।
सुदामा रास्ते में चले जाते थे और मन ही मन कृष्णा की बद्धमुष्ठिता पर खीझते थे । जब अपने घर पहुंचे तो उन्हें अपनी टूटी मढ़ैया नहीं दिख पड़ी । उसके स्थान पर एक विशालकाय प्रासाद खड़ा पाया । पत्नी ने पति को पहचाना । जब वे महल के भीतर गए तब अपना ऐश्वर्य देख मुग्ध हो गये और भगवान की दानशीलता और भक्तवत्सलता का अवलोकन कर वह अवाक् हो रहे । बहुत दिनों तक अपनी साध्वी पत्नी के साथ सुखपूर्वक दिन बिता अंत में भगवान के चिरंतन सुखमय लोक में चले गये ।
मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016
धूंधुकारी को प्रेत योनि की प्राप्ति और उससे उद्धार
धूंधुकारी को प्रेत योनि की प्राप्ति और उससे उद्धार
श्रीमद् भागवत - पाँचवा अध्याय
आत्मदेव ब्राम्ह ण संतान न होने से दुखी था | वन में महात्मा ने उसे एक फल देकर कहा की इसे अपनी स्त्री को खिला दे |उसकी पत्नी धूंधुलि ने फल गाय को खिला दिया | धूंधुलि ने अपनी बहिन के साथ मिलकर नाटक रचा | उसकी बहिन उस समय गर्भवती थी | धूंधुलि खुद गर्भवती होने का नाटक करती रही | समय आने पर उसने अपनी बहिन का बच्चा ले लियाऔर लोगो को कह दिया की उसकी
बहिन को मरा हुआ बच्चा हुआ है | इस काम के लिए बहिन के पति को बहुत सा धन भी दिया | इस तरह धूंधुलि ने अपने बच्चे का नाम धूंधुकारी रखा | कुछ समय बाद गाय को भी मनुष्यकार बच्चा हुआ |
उसके गाय के जेसे कान होने से आत्मदेव ने
उसका नाम गौ कर्ण रखा | धूंधुकारी बहुत ही दुष्ट तथा हिंसक प्रवृति का था |इसके विपरीत गौ कर्ण ज्ञानी और दानी था | धूंधुकारी से तंग आकर आत्मदेव वन को
चले गये |
पिता के वन चले जाने पर एक दिन
धूंधुकारी ने अपनी माता को बहुत पीटा और कहा - बता ! धन कहाँ रखा है ? नहीं तो जलती लकड़ी से तेरी खबर लूँगा |उसकी इस धमकी से डर कर तथा दुखी
होकर धूंधुलि ने कुएँ में गिर कर प्राण त्याग दिए | धूंधुकारी पाँच वैश्याओं के साथ घर में रहने लगा |
वह जहाँ तहाँ से बहुत सा धन चुरा के लाता | चोरी का माल देख कर एक दिन वैश्याओं ने सोचा -" यह नित्य ही चोरी करता है | इसे अवश्य ही राजा पकड़ लेगा
और कड़ा दंड देगा | इसे मारकर , सारा
माल लेकर हम कहीं चली जाएँगी | " ऐसा निश्चय करके उन्होने सोए हुए धूंधुकारी को रस्सी से कस दिया और गले में फाँसी लगाकर मारने का प्रयत्न किया | इससे भी
वह नही मारा तो उस के मुख पर जलते हुए
अंगारे डाले | इससे वह तड़प तड़प कर मर गया | उन्होने उसके शरीर को एक गड्ढे में डाल कर गाढ दिया|
धूंधुकारी अपने कर्मों के कारण भयंकर प्रेत हुआ | वह सर्वदा दसों दिशाओं में भटकता रहता था | और भूख प्यास से व्याकुल होने के कारण " हा देव ! ! हा देव ! ! "
चिल्लाता रहता था परंतु उसे कोई आश्रय नही मिलता |
जब गौ कर्ण को अपने भाई की मृत्यु का समाचार मिला तो उन्होने उसका गयाजी में श्राद्ध किया | वह जहाँ भी जाते ,धूंधुकारी के नाम से दान करते | घूमते घूमते
वह अपने नगर पहुँचे | रात्रि के समय अपने
घर के आँगन मे सो गये | अपने भाई गौ कर्ण को सोया देख धूंधुकारी ने अपना विकट रूप दिखाया | वह कभी भे ड़ा , हाथी ,भेंसा तो कभी इंद्र , अग्नि का रूप धारण
करता | अंत में वह मनुष्यकार में प्रकट हुआ | ये विपरीत अवस्थाएं देख कर गौ कर्ण ने निश्चय कर लिया था की यह अवश्य ही दुर्गति को प्राप्त हुआ है |
तब उन्होनें धैर्य पूर्वक पूछा - " तू कौन है ?
रात्रि के समय एसा भयानक रूप क्यूँ
दिखा रहा है ? तेरी यहा दशा कैसे हुई ? "
गौ कर्ण के इस प्रकार पूछने पर प्रेत ज़ोर
ज़ोर से रोने लगा | उसने कहा - मैं तुम्हारा
भाई धूंधुकारी हूँ | मैं महान अज्ञान में
चक्कर काट रहा था | मैने लोगों की बड़ी
हिंसा की | इसी से मैं प्रेत योनि में
पड़कर दुर्दशा भोग रहा हूँ | भाई ! तुम दया
के सागर हो | कैसे भी करके मुझे इस प्रेत
योनि से मुक्ति दिलाओ |
गौ कर्ण ने कहा - मैने तुम्हारे लिए विधि
पूर्वक गया जी में पिंड दान किया | फिर
भी तुम्हे मुक्ति नहीं मिली | मुझे क्या
करना चाहिए ? प्रेत बोला - मेरी मुक्ति
सैंकड़ों गया श्राद्ध से भी नहीं हो सकती |
गौ कर्ण ने कहा - तब तो तुम्हारी मुक्ति
असंभव है | तुम अभी निर्भय होकर अपने
स्थान पर रहो | मैं विचार करके तुम्हारी
मुक्ति के लिए उपाय करूँगा |
गौ कर्ण की आग्या पाकर धूंधुकारी वहाँ
से चला गया | सुबह होने पर गौ कर्ण ने
लोगों को सारी बात बताई | उनमें से जो
विद्वान थे , उन्होने कहा की इस विष य
में जो सूर्यनारायण कहें वही करना
चाहिए | अतः गौ कर्ण ने अपने तपोबल से
सूर्य की गति को रोक दिया | उन्होने
स्तुति की - भगवान ! आप सारे संसार के
साक्षी हैं | कृपा करके मुझे धूंधुकारी की
मुक्ति का उपाय बताएँ | तब सूर्यनारायण
ने कहा - श्रीमद् भागवत से मुक्ति हो
सकती है | उसका सप्ताह परायण करो |
गौ कर्ण जी निश्चय करके कथा सुनाने को
तैयार हो गये | जब गौ कर्ण जी कथा
सुनाने को व्यास गद्दी पर बैठकर कथा कहने
लगे , तब प्रेत भी वहाँ आ गया इधर उधर
बैठने का स्थान ढूढ़ने लगा | तब वह सात
गाँठ के एक बाँस के छेद में घुसकर बैठ
गया |
सायँ काल को जब कथा को विश्राम
दिया गया , तभी बाँस की एक गाँठ
त ड़ त ड़ करती हुई फट गयी | दूसरे दिन
दूसरी गाँठ | इस प्रकार से सात दिनों में
सातों गाँठों को फोड़कर , बारह स्कंधो
को सुनकर , धूंधुकारी प्रेत योनि से मुक्त
हो गया और दिव्य रूप धारण करके सब के
सामने प्रकट हुआ | उसने तुरंत गौ कर्ण को
प्रणाम करके कहा - भाई ! तुमने कृपा करके
मुझे प्रेत योनि से मुक्ति दिला दी | यह
प्रेत पीड़ा का नाश करने वाली श्रीमद्
भागवत कथा धन्य है |
जिस समय धूंधुकारी यह सब बातें कह रहा
था , उसी समय उसके लिए वैकुंठ वासी
पार्षदों सहित विमान उतरा | सब लोगों
के सामने धूंधुकारी उसमें चढ़ गया | तब
गौ कर्ण ने कहा - भगवान के प्रिय
पार्षदों ! यहाँ तो अनेक श्रोता गण हैं |
फिर उन सब के लिए आप लोग बहुत से
विमान क्यूँ नहीं लाए ? यहाँ सभी ने
समान रूप से कथा सुनी है | फिर अंत में
इस प्रकार का भेद क्यूँ ?
भगवान के सेवकों ने कहा - इस फल भेद
का कारण इनका श्रवण भेद ही है | श्रवण
तो सभी ने समान रूप से किया , परंतु
इसके ( प्रेत ) के जैसा मनन नहीं किया |
इस प्रेत ने सात दिन तक निराहार श्रवण
किया था | अतः मुक्ति को प्राप्त हुआ |
एसा कहकर हरी कीर्तन करते हुए पार्षद
वैकुंठ लोक चले गये |
श्रावण मास में गौ कर्ण जी ने फिर से
सप्ताह क्रम में कथा कही और उन
श्रोताओं ने फिर से कथा सुनी | इस बार
भक्तो के लिए विमान के साथ भगवान
प्रकट हुए | भगवान स्वयं हर्षित होकर अपने
पाँच जन्य शंख से ध्वनि करने लगे तथा
गौ कर्ण को हृदय से लगा कर अपने समान
बना लिया |
यह कथा बहुत पवित्र है | एक बार के
श्रवण से ही समस्त पाप राशि को नष्ट
कर देती है | यदि इसका श्राद्ध के समय
पाठ किया जाए , तो इससे पित्र गण को
बड़ी तृप्ति मिलती है | और नित्य पाठ
करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है |
सोमवार, 7 सितंबर 2015
राजा परीक्षित का पश्चाताप
राजा परीक्षित का पश्चाताप
राजगृह में पहुँच कर जब राजा परीक्षित ने अपना मुकुट उतारा तो कलियुग का प्रभाव समाप्त हो गया और ज्ञान की पुनः उत्पत्ति हुई। वे सोचने लगे कि मैने घोर पाप कर डाला है। निरपराध ब्राह्मण के कंठ में मरे हुये सर्प को डाल कर मैंने बहुत बड़ा कुकृत्य किया है। इस प्रकार वे पश्चाताप कर रहे थे कि ऋषि शमीक का भेजा हुआ एक शिष्य ने आकर उन्हें बताया कि ऋषिकुमार ने आपको श्राप दिया है कि आज से सातवें दिन तक्षक सर्प आपको डस लेगा। राजा परीक्षित ने शिष्य को प्रसन्नतापूर्वक आसन दिया और बोले – “ऋषिकुमार ने श्राप देकर मुझ पर बहुत बड़ा उपकार किया है। मेरी भी यही इच्छा है कि मुझ जैसे पापी को मेरे पाप के लिय दण्ड मिलना ही चाहिये। आप ऋषिकुमार को मेरा यह संदेश पहुँचा दीजिये कि मैं उनके इस कृपा के लिये उनका अत्यंत आभारी हूँ।” उस शिष्य का यथोचित सम्मान कर के और क्षमायाचना कर के राजा परीक्षित ने विदा किया।
राजा परीक्षित ने अपने जीवन के शेष सात दिन को ज्ञान प्राप्ति और भगवत्भक्ति में व्यतीत करने का संकल्प कर लिया। अपने समर्थ पुत्र जनमेजय का राज्याभिषेक कर दिया और समस्त राजसी वस्त्राभूषणों को त्यागकर तथा केवल चीर वस्त्र धारण कर गंगा के तट पर बैठ गये। अपनी समस्त आसक्तियों को त्याग कर भगवान श्रीकृष्णचन्द्र की भक्ति में स्वयं को लीन कर लिया। उनके इस त्याग और व्रत के विषय में सुन कर अत्रि, वशिष्ठ, च्यवन, अरिष्टनेमि, शारद्वान, पाराशर, अंगिरा, भृगु, परशुराम, विश्वामित्र, इन्द्रमद, उतथ्य, मेधातिथि, देवल, मैत्रेय, पिप्पलाद, गौतम, भारद्वाज, और्व, कण्डव, अगस्त्य, नारद, वेदव्यास आदि ऋषि, महर्षि और देवर्षि अपने अपने शिष्यों के साथ उनके दर्शन को पधारे।
राजा परीक्षित ने उन सभी का यथोचित समयानुकूल सत्कार करके उन्हें आसन दिया, उनके चरणों की वन्दना की और कहा – “यह मेरा परम सौभाग्य है कि आप जैस देवता तुल्य ऋषियों के दर्शन प्राप्त हुये। मैंने सत्ता के मद में चूर होकर परम तेजस्वी ब्राह्मण के प्रति अपराध किया है फिर भी आप लोगों ने मुझे दर्शन देने के लिये यहाँ तक आने का कष्ट किया यह आप लोगों की महानता है। मेरी इच्छा है कि मैं अपने जीवन के शेष सात दिनों का सदुपयोग ज्ञान प्राप्ति और भगवत्भक्ति में करूँ। अतः आप सब लोगों से मेरा निवेदन है कि आप लोग वह सुगम मार्ग बताइये जिस पर चल कर मैं भगवान को प्राप्त कर सकूँ।”
राजा परीक्षित के वचनों को सुन कर सभी अत्यंत प्रसन्न हुये और यथायोग्य उनकी इच्छा को पूर्ण करने का निश्चय कर लिया। उसी समय वहाँ पर व्यास ऋषि के पुत्र, जन्म मृत्यु से रहित परमज्ञानी श्री शुकदेव जी पधारे। समस्त ऋषियों सहित राजा परीक्षित उनके सम्मान में उठ कर खड़े हो गये और उन्हें प्रणाम किया। उसके बाद अर्ध्य, पाद्य तथा माला आदि से सूर्य के समान प्रकाशमान श्री शुकदेव जी की पूजा की और बैठने के लिये उच्चासन प्रदान किया। उनके बैठने के बाद अन्य ऋषि भी अपने अपने आसन पर बैठ गये। सभी के आसन ग्रहण करने के पश्चात् राजा परीक्षित ने मधुर वाणी मे कहा – “हे ब्रह्मरूप योगेश्वर! हे महाभाग! भगवान नारायण के सम्मुख आने से जिस प्रकार दैत्य भाग जाते हैं उसी प्रकार आपके पधारने से महान पाप भी अविलंब भाग खड़े होते हैं। आप जैसे योगेश्वर के दर्शन अत्यंत दुर्लभ है पर आपने स्वयं मेरी मृत्यु के समय पधार कर मुझ पापी को दर्शन देकर मुझे मेरे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दिया है। आप योगियों के भी गुरु हैं, आपने परम सिद्धि प्राप्त की है। अतः कृपा करके यह बताइये कि मरणासन्न प्राणी के लिये क्या कर्तव्य है? उसे किस कथा का श्रवण, किस देवता का जप, अनुष्ठान, स्मरण तथा भजन करना चाहिये और किन किन बातों का त्याग कर देना चाहिये?
समस्त ऋषियों ने राजा परीक्षित के इन प्रश्नों के पूछने के लिये साधुवाद दिया और उनके प्रश्नों के उत्तर देने के लिये महायोगी श्री शुकदेव जी से आग्रह किया। समस्त धर्मों के ज्ञाता परमज्ञानी श्री शुकदेव जी जिन्होंने नाल छेदन के समय से ही इस संसार की माया को त्याग कर परमहंस व्रत से ब्रह्मज्ञान प्राप्त किया है उनके प्रश्नों का उत्तर देने के लिये तैयार हो गये।