शनिवार, 25 जून 2016

बन्दा सिंह बहादुर *part 1

बन्दा सिंह बहादुर
*part 1
1. जन्म जत्थेदार बन्दा सिंह बहादुर*
बन्दा सिँघ बहादुर जी का जन्म 16 अक्टूबर 1670 ई को जम्मू-कश्मीर के पुँछ जिले के एक गाँव रजौरी में हुआ। उनके बचपन का नाम लछमन दास था। आपके पिता रामदेव स्थानीय जमींदार थे। जिस कारण आपके पास धन-सम्पदा का अभाव न था। आपने अपने बेटे लछमन दास को रिवाज़ के अनुसार घुड़सवारी, शिकार खेलना, कुश्तियाँ आदि के करतब सिखलाए किन्तु शिक्षा पर विशेष ध्यान नहीं दिया।
अभी लछमन दास का बचपन समाप्त ही हुआ था और यौवन में पदार्पण ही किया था कि अचानक एक घटना उनके जीवन में असाधारण परिवर्तन ले आई। एक बार उन्होंने एक हिरनी का शिकार किया। जिसके पेट में से दो बच्चे निकले और तड़प कर मर गये। इस घटना ने लछमनदास के मन पर गहरा प्रभाव डाला और वह अशाँत से रहने लगे। मानसिक तनाव से छुटकारा पाने के लिए वह साधु संगत करने लगे।
एक बार जानकी प्रसाद नामक साधु राजौरी में आया। लछमनदास ने उसके समक्ष अपने मन की व्यथा बताई तो जानकी प्रसाद उसे अपने सँग लाहौर नगर के आश्रम में ले आया। और उसने लछमन दास का नाम माधो दास रख दिया। क्योंकि जानकी दास को भय था कि जमींदार रामदेव अपने पुत्र को खोजता यहाँ न आ जाए।
किन्तु लछमन दास अथवा माधो दास के मन का भटकना समाप्त नहीं हुआ। अतः वह शान्ति की खोज में जुटा रहा। लाहौर नगर के निकट कसूर क्षेत्र में सन 1686 ईसवी की वैसाखी के मेले पर उन्होंने एक और साधु रामदास को अपना गुरू धारण किया और वह उस साधु के साथ दक्षिण भारत की यात्रा पर चले गये। बहुत से तीर्थों की यात्रा की किन्तु शाश्वत ज्ञान कहीं प्राप्त न हुआ।
इस बीच पँचवटी में उसकी मुलाकात एक योगी औघड़नाथ के साथ हुई। यह योगी ऋद्धियों-सिद्धि
यों तथा ताँत्रिक विद्या जानने के कारण बहुत प्रसिद्ध था। तँत्र-मँत्र तथा योग विद्या सीखने की भावना से माधोदास ने इस योगी की खूब सेवा की। जिससे प्रसन्न होकर औघड़ नाथ ने योग की गूढ़ साधनाएँ व जादू के भेद उसको सिखा दिये। योगी की मृत्यु के पश्चात् माधेदास ने गोदावरी नदी के तट पर नांदेड़ नगर में एक रमणीक स्थल पर अपना नया आश्रम बनाया।
यहाँ माधोदास ने ऋद्धि-सिद्धि अथवा जन्त्र-मन्त्र की चमत्कारी शक्तियाँ दिखाकर जनसाधारण को प्रभावित किया। जिससे स्थानीय लोग उन्हें मानने लगे और कुछ एक उनके शिष्य बन गये। जिससे माधेदास अभिमानी हो गया। वह प्रत्येक कार्य अपने स्वार्थ के लिए करने लगा। वह परोपकार का मार्ग भूल गया।
अतः वह लोक भलाई के लिए कुछ भी न कर पाया बल्कि अपनी आत्मिक शक्ति का प्रदर्शन करके लोगों को भयभीत करने लगा जिससे लोग अभिशाप के भय से धन अथवा आवश्यक सामग्री इत्यादि आश्रम में पहुँचाने लगे। यदि कोई अन्य साधु इस क्षेत्र में आता तो माधोदास उसका अपमान करके उसे वहाँ से भगा देता। इस बात की चर्चा दूर दूर तक होने लगी कि माधेदास तपस्वी अभिमानी और हठी प्रवृत्ति का है, वह अन्य सन्तों की खिल्ली उड़ाता है।
गुरू गोबिन्द सिंघ जी ने इस चुनौती को स्वीकार किया और उसके आश्रम में जाकर उसे ललकारने के विचार से आश्रम की मर्यादा के विपरीत अपने शिष्यों को कार्य करने का आदेश दिया। .

शुक्रवार, 24 जून 2016

बजरंगबली कैसे बने पंचमुखी हनुमान..

बजरंगबली कैसे बने पंचमुखी हनुमान...पढ़ें पौराणिक कथा

जानें पंचमुखी हनुमान की पौराणिक कथा
जब राम और रावण की सेना के मध्य भयंकर युद्ध चल रहा था और रावण अपने पराजय के समीप था तब इस समस्या से उबरने के लिए उसने अपने मायावी भाई अहिरावन को याद किया जो मां भवानी का परम भक्त होने के साथ साथ तंत्र मंत्र का का बड़ा ज्ञाता था। उसने अपने माया के दम पर भगवान राम की सारी सेना को निद्रा में डाल दिया तथा राम एव लक्ष्मण का अपरहण कर उनकी देने उन्हें पाताल लोक ले गया।
कुछ घंटे बाद जब माया का प्रभाव कम हुआ तब विभिषण ने यह पहचान लिया कि यह कार्य अहिरावन का है और उसने हनुमानजी को श्री राम और लक्ष्मण सहायता करने के लिए पाताल लोक जाने को कहा। पाताल लोक के द्वार पर उन्हें उनका पुत्र मकरध्वज मिला और युद्ध में उसे हराने के बाद बंधक श्री राम और लक्ष्मण से मिले।
वहां पांच दीपक उन्हें पांच जगह पर पांच दिशाओं में मिले जिसे अहिरावण ने मां भवानी के लिए जलाए थे। इन पांचों दीपक को एक साथ बुझाने पर अहिरावन का वध हो जाएगा इसी कारण हनुमान जी ने पंचमुखी रूप धरा।
उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण दिशा में नरसिंह मुख, पश्चिम में गरुड़ मुख, आकाश की तरफ हयग्रीव मुख एवं पूर्व दिशा में हनुमान मुख। इस रूप को धरकर उन्होंने वे पांचों दीप बुझाए तथा अहिरावण का वध कर राम,लक्ष्मण को उस से मुक्त किया।

इसी प्रसंग में हमें एक दूसरी कथा भी मिलती है कि जब मरियल नाम का दानव भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र चुराता है और यह बात जब हनुमान को पता लगती है तो वह संकल्प लेते हैं कि वे चक्र पुनः प्राप्त कर भगवान विष्णु को सौप देंगे।
मरियल दानव इच्छानुसार रूप बदलने में माहिर था अत: विष्णु भगवान ने हनुमानजी को आशीर्वाद दिया, साथ ही इच्छानुसार वायुगमन की शक्ति के साथ गरुड़-मुख, भय उत्पन्न करने वाला नरसिंह-मुख, हयग्रीव मुख ज्ञान प्राप्त करने के लिए तथा वराह मुख सुख व समृद्धि के लिए था। पार्वती जी ने उन्हें कमल पुष्प एवं यम-धर्मराज ने उन्हें पाश नामक अस्त्र प्रदान किया। आशीर्वाद एवं इन सबकी शक्तियों के साथ हनुमान जी मरियल पर विजय प्राप्त करने में सफल रहे। तभी से उनके इस पंचमुखी स्वरूप को भी मान्यता प्राप्त हुई।

मंगलवार, 7 जून 2016

पांडवों व द्रौपदी की मृत्यु, क्या हुआ था स्वर्ग जाने के रास्ते में?

कैसे हुई पांडवों व द्रौपदी की मृत्यु, क्या हुआ था स्वर्ग जाने के रास्ते में?

पांडव जब स्वर्ग जाने के लिए निकले तो रास्ते में ही द्रौपदी सहित भीम, अर्जुन, नकुल व सहदेव की मृत्यु हो गई। सिर्फ युधिष्ठिर ही सशरीर स्वर्ग जा पाए। ये बात हम सभी जानते हैं। लेकिन युधिष्ठिर के अलावा अन्य पांडवों व द्रौपदी की मृत्यु क्यों हुई, ये बात बहुत कम लोगों को पता है। आज हम आपको बता रहे हैं युधिष्ठिर कैसे पहुंचे सशरीर स्वर्ग और रास्ते में ही क्यों हो गई द्रौपदी व अन्य पांडवों की मृत्यु?
ऐसे शुरू की पांडवों ने स्वर्ग जाने की यात्रा
भगवान श्रीकृष्ण की मृत्यु के बाद महर्षि वेदव्यास की बात मानकर द्रौपदी सहित पांडवों ने राज-पाठ त्याग कर सशरीर स्वर्ग जाने का निश्चय किया। युधिष्ठिर ने परीक्षित का राज्याभिषेक कर दिया। इसके बाद पांडवों व द्रौपदी ने साधुओं के वस्त्र धारण किए और स्वर्ग जाने के लिए निकल पड़े। पांडवों के साथ-साथ एक कुत्ता भी चलने लगा। पांडवों ने पृथ्वी की परिक्रमा पूरी करने की इच्छा से उत्तर दिशा की ओर यात्रा की। यात्रा करते-करते पांडव हिमालय तक पहुंच गए। हिमालय लांघ कर पांडव आगे बढ़े तो उन्हें बालू का समुद्र दिखाई पड़ा। इसके बाद उन्होंने सुमेरु पर्वत के दर्शन किए।

सबसे पहले द्रौपदी का हुआ पतन
पांचों पांडव, द्रौपदी तथा वह कुत्ता जब सुमेरु पर्वत पर चढ़ रहे थे, तभी द्रौपदी लड़खड़ाकर गिर पड़ी। द्रौपदी को गिरा देख भीम ने युधिष्ठिर से कहा कि- द्रौपदी ने कभी कोई पाप नहीं किया। तो फिर क्या कारण है कि वह नीचे गिर पड़ी? युधिष्ठिर ने कहा कि- द्रौपदी हम सभी में अर्जुन को अधिक प्रेम करती थीं। इसलिए उसके साथ ऐसा हुआ है। ऐसा कहकर युधिष्ठिर द्रौपदी को देखे बिना ही आगे बढ़ गए।

फिर गिरे सहदेव
द्रौपदी के गिरने के थोड़ी देर बाद सहदेव भी गिर पड़े। भीम ने सहदेव के गिरने का कारण पूछा तो युधिष्ठिर ने बताया कि सहदेव किसी को अपने जैसा विद्वान नहीं समझता था, इसी दोष के कारण इसे आज गिरना पड़ा है।

ऐसे हुई नकुल की मृत्यु
द्रौपदी व सहदेव के बाद चलते-चलते नकुल भी गिर पड़े। भीम ने जब युधिष्ठिर से इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि नकुल को अपने रूप पर बहुत अभिमान था। वह किसी को अपने समान रूपवान नहीं समझता था। इसलिए आज इसकी यह गति हुई है।

ये था अर्जुन के पतन का कारण
युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन व वह कुत्ता जब आगे चल रहे थे, तभी थोड़ी देर बाद अर्जुन भी गिर पड़े। युधिष्ठिर ने भीम को बताया कि अर्जुन को अपने पराक्रम पर बहुत अभिमान था। इसने कहा थी कि मैं एक ही दिन में शत्रुओं का नाश कर दूंगा, लेकिन ऐसा किया नहीं। अपने अभिमान के कारण ही अर्जुन की आज यह हालत हुई है। ऐसा कहकर युधिष्ठिर आगे बढ़ गए।

इसलिए हुआ का भीम पतन
थोड़ी आगे चलने पर भीम भी गिर गए। तब भीम ने युधिष्ठिर को पुकार कर पूछा कि- हे राजन यदि आप जानते हैं तो मेरे पतन का कारण बताईए? तब युधिष्ठिर ने बताया कि तुम खाते बहुत थे और अपने बल का झूठा प्रदर्शन करते थे। इसलिए तुम्हें आज भूमि पर गिरना पड़ा है। यह कहकर युधिष्ठिर आगे चल दिए। केवल वह कुत्ता ही उनके साथ चलता रहा।

सशरीर स्वर्ग गए थे युधिष्ठिर
युधिष्ठिर कुछ ही दूर चले थे कि उन्हें स्वर्ग ले जाने के लिए स्वयं देवराज इंद्र अपना रथ लेकर आ गए। तब युधिष्ठिर ने इंद्र से कहा कि- मेरे भाई और द्रौपदी मार्ग में ही गिर पड़े हैं। वे भी हमारे हमारे साथ चलें, ऐसी व्यवस्था कीजिए। तब इंद्र ने कहा कि वे सभी पहले ही स्वर्ग पहुंच चुके हैं। वे शरीर त्याग कर स्वर्ग पहुंचे हैं और आप सशरीर स्वर्ग में जाएंगे।

यमराज ने लिया था कुत्ते का रूप
इंद्र की बात सुनकर युधिष्ठिर ने कहा कि यह कुत्ता मेरा परम भक्त है। इसलिए इसे भी मेरे साथ स्वर्ग जाने की आज्ञा दीजिए, लेकिन इंद्र ने ऐसा करने से मना कर दिया। काफी देर समझाने पर भी जब युधिष्ठिर बिना कुत्ते के स्वर्ग जाने के लिए नहीं माने तो कुत्ते के रूप में यमराज अपने वास्तविक स्वरूप में आ गए (वह कुत्ता वास्तव में यमराज का ही रूप था)। युधिष्ठिर को अपने धर्म में स्थित देखकर यमराज बहुत प्रसन्न हुए। इसके बाद देवराज इंद्र युधिष्ठिर को अपने रथ में बैठाकर सशरीर स्वर्ग ले गए।