अगस्त्याश्रम में
लोमश ऋषि युधिष्ठिर से बोले, “हे राजन्! सत्युग में वृत्रासुर नामक एक बहुत ही शक्तिशाली दैत्य हो गया था। उसने इन्द्रादि देवताओं पर विजय प्राप्त कर उन्हें बहुत कष्ट दिया। उससे मुक्ति पाने का उपाय पूछने के लिये देवतागण ब्रह्मा जी के पास पहुँचे। ब्रह्मा जी ने कहा कि दधीचि ऋषि की हड्डियों से बने वज्र से ही वृत्रासुर का वध सम्भव है। इस पर देवतागणों ने दधीचि ऋषि के पास जाकर उन्हें प्रणाम किया और अपनी समस्या बताई। देवताओं का कष्ट देख कर दधीचि ऋषि ने तत्काल अपना शरीर त्याग दिया। तप के तेज से तपी हुई अस्थियों से विश्वकर्मा ने एक अत्यन्त कठोर वज्र का निर्माण किया। उस वज्र को लेकर देवराज इन्द्र ने वृत्रासुर के साथ घोर युद्ध करके उसका वध कर दिया।
“वृत्रासुर के वध हो जाने के पश्चात् उसके साथी असुर समुद्र में जा छुपे। देवताओं ने भगवान नारायण के पास जाकर इन छुपे हुये असुरों को मारने का उपाय पूछा। भगवान नारायण ने देवताओं से कहा कि तुम लोग अगस्त्य ऋषि की शरण में जाकर समुद्र को सोख लेने की प्रार्थना करो। देवताओं की प्रार्थना सुनकर अगस्त्य ऋषि ने सागर के समस्त पानी को पी लिया और समुद्र सूख गया तथा उसमें छुपे हुये असुर मारे गये।
“उन असुरों का नाश हो जाने के बाद देवताओं ने अगस्त्य ऋषि से विनती की कि वे समुद्र को पुनः भर दें। इस पर अगस्त्य ऋषि ने कहा कि समुद्र का जल तो मेरे पेट के भीतर पच चुका है इसलिये तुम लोग समुद्र को भरने का कोई दूसरा उपाय सोचो। देवता लोग ब्रह्मा जी के पास समुद्र को पुनः भरने का उपाय पूछने गये। ब्रह्मा जी ने बताया कि कुछ काल बाद सगर के वंशज राजा भगीरथ अपने पूर्वजों के उद्धार हेतु गंगा को पृथ्वी पर लायेंगे तभी यह समुद्र पूर्व की तरह भर जायेगा।”
इतना सुनने के बाद युधिष्ठिर ने पुनः प्रश्न किया, “हे ऋषिराज! अगस्त्य ऋषि ने विन्ध्य पर्वत की वृद्धि को किस प्रकार रोका यह कथा भी कृपा करके हमें सुनायें।” लोमश ऋषि बोले, “सूर्यदेव उदय होने से लेकर अस्त होने तक सुमेरु पर्वत की प्रदक्षिणा किया करते थे। इस पर विन्ध्य पर्वत ने सूर्य से कहा कि हे सूर्यदेव! सुमेरु गिरि की ही भाँति तुम मेरी भी प्रदक्षिणा किया करो। यह सुनकर सूर्यदेव बोले कि मैं स्वेच्छा से सुमेरु पर्वत की प्रदक्षिणा नहीं करता वरन् संसार के निर्माणकर्ता ने मेरा यह मार्ग निर्धारित किया है। सूर्य के वचनों को सुन कर विन्ध्याचल पर्वत अत्यन्त क्रोधित हो गया और वह सूर्य-चन्द्रमा के मार्ग को रोकने के लिये सीधे आकाश की ओर बढ़ने लगा। यह सुने कर देवताओं ने विन्ध्य पर्वत की हर तरह से विनती की किन्तु उसने किसी की न सुनी। थक हार कर देवतागणों ने अगस्त्य ऋषि से विन्ध्याचल को रोकने की प्रार्थना की। देवताओं की विनती स्वीकार करके अगस्त्य मुनि सीधे विन्ध्य पर्वत के पास जा पहुँचे। विन्ध्य ने अगस्त्य ऋषि को आया देख कर झुक कर उन्हें प्रणाम किया और पूछा कि हे मुने! मेरे लिये क्या आज्ञा है? ऋषि अगस्त्य बोले कि मैं दक्षिण दिशा को जा रहा हूँ, तुम मुझे जाने का रास्ता दो और जब तक मैं लौटकर न आ जाऊँ तब तक मेरी प्रतीक्षा करते रहना। विन्ध्याचल ने अगस्त्य जी की यह बात स्वीकार कर ली और तब से अब तक अगस्त्य ऋषि के आगमन की प्रतीक्षा में वैसे ही झुका पड़ा है।”
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